(धर्मपाल सिंह की ब्यूरो रिपोर्ट)
पीलीभीत।जनपद की राजनीति में आगामी 2027 विधानसभा चुनाव से पहले हलचल तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी के पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू के समाजवादी खेमे के नजदीक आने की चर्चाओं के बीच अब भाजपा नेता व पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा की संभावित ‘घर वापसी’ ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। यदि यह घटनाक्रम औपचारिक रूप लेता है तो इसे जिले में भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण झटका माना जाएगा।
लोकसभा के बाद बदले समीकरण
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार हेमराज वर्मा ने लोकसभा चुनाव से पहले बड़ी अपेक्षाओं के साथ भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा था। उस समय कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी उन्हें पीलीभीत संसदीय सीट से प्रत्याशी बना सकती है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया। चुनाव उपरांत भी वर्मा को संगठन अथवा सरकार में कोई अहम दायित्व न मिलने से उनके समर्थकों में असंतोष की चर्चा बनी रही।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी पृष्ठभूमि में वर्मा की पुनः समाजवादी पार्टी के संपर्क में सक्रियता को देखा जा रहा है। हालांकि अभी तक किसी पक्ष की ओर से औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सियासी गलियारों में इस संभावित वापसी को लगभग तय माना जा रहा है।
सदर सीट पर संभावित दावेदारी
सूत्रों के मुताबिक हेमराज वर्मा की नजर पीलीभीत सदर विधानसभा सीट पर है। क्षेत्र में उनकी सामाजिक व व्यक्तिगत पकड़ को देखते हुए सपा उन्हें 2027 में मजबूत दावेदार के रूप में आगे बढ़ा सकती है।यदि ऐसा होता है तो सदर सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय या सीधा भाजपा–सपा के बीच कड़ा हो सकता है। भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का विषय मानी जाती रही है।
सोशल इंजीनियरिंग पर प्रभाव
भाजपा ने बीते चुनावों में सामाजिक संतुलन और संगठनात्मक मजबूती के सहारे जिले में प्रभावशाली स्थिति बनाई थी। किंतु यदि प्रभावशाली चेहरे लगातार दूरी बनाते हैं तो इसका असर पार्टी की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ रणनीति पर पड़ सकता है।फूल बाबू और हेमराज वर्मा जैसे नेताओं की संभावित सपा निकटता से पिछड़ा, अल्पसंख्यक और परंपरागत वोट बैंक में नई गोलबंदी की संभावना जताई जा रही है।
भाजपा की सक्रियता बढ़ी
दूसरी ओर भाजपा नेतृत्व जिले में बदलते समीकरणों को लेकर सतर्क है। संगठन स्तर पर फीडबैक लिया जा रहा है और बूथ प्रबंधन को सुदृढ़ करने की कवायद शुरू कर दी गई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 2027 को देखते हुए प्रत्याशी चयन में इस बार विशेष सावधानी बरती जाएगी और असंतोष की संभावनाओं को समय रहते समाप्त करने की रणनीति बनाई जा रही है।
आगे क्या?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि हेमराज वर्मा की सपा में वापसी औपचारिक रूप लेती है तो पीलीभीत में चुनावी मुकाबले की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।फिलहाल जिले की राजनीति में अनिश्चितता और संभावनाओं का दौर जारी है, लेकिन इतना तय है कि 2027 का चुनाव पीलीभीत में बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है।
