संवाददाता:- अरुन वर्मा

पीलीभीत:- देश में लगातार बढ़ती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है, लेकिन सबसे ज्यादा असर अगर किसी पर पड़ा है तो वह है देश का अन्नदाता—किसान। खेत में दिन-रात मेहनत करने वाला किसान आज खुद ही आर्थिक तंगी और कर्ज के जाल में फंसा नजर आ रहा है। डीजल, खाद, बीज और कीटनाशकों के दाम आसमान छू रहे हैं, जबकि फसलों का उचित मूल्य आज भी किसानों के लिए एक सपना बना हुआ है। गांवों में हालात ऐसे हैं कि किसान लागत निकालने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। महंगाई के इस दौर में खेती करना लगातार घाटे का सौदा बनता जा रहा है। सरकार की तमाम योजनाएं और दावे जमीनी स्तर पर कितने कारगर हैं, यह किसानों की हालत खुद बयां कर रही है। किसानों का कहना है कि फसल तैयार करने में जितना खर्च आता है, बाजार में उन्हें उसका वाजिब दाम नहीं मिल पाता। मंडियों में बिचौलियों का दबदबा आज भी कायम है, जिससे किसानों की मेहनत का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। वहीं, बिजली की बढ़ती दरें और सिंचाई की समस्याएं किसानों की मुश्किलों को और बढ़ा रही हैं। महंगाई का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों के घर-परिवार पर भी साफ दिखाई दे रहा है। रोजमर्रा की जरूरतों जैसे खाद्य सामग्री, दवाइयां, शिक्षा और अन्य खर्चों में बढ़ोतरी ने किसानों के जीवन स्तर को प्रभावित किया है। जरूरत इस बात की है कि सरकार किसानों के हित में ठोस और प्रभावी कदम उठाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा देने, खेती में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण करने और किसानों को सीधी आर्थिक सहायता प्रदान करने जैसे कदम ही इस संकट से उबार सकते हैं। अगर समय रहते किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है।
