संवाददाता:- अरुन वर्मा के साथ धर्मपाल सिंह

कलीनगर (पीलीभीत): केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ ज़मीनी स्तर पर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसका ताजा उदाहरण कलीनगर तहसील क्षेत्र के लालपुर ता. माधौटांडा गांव में देखने को मिला, जहां एक विकलांग पति-पत्नी न्याय की गुहार लेकर तहसील समाधान दिवस में पहुंचे।पीड़िता रीना देवी पत्नी ओमपाल ने अधिकारियों के सामने अपनी व्यथा रखते हुए बताया कि वह और उनके पति दोनों ही विकलांग हैं और बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। रहने के लिए पक्का मकान तक नहीं है, फिर भी उन्हें सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
रीना देवी का आरोप है कि उन्होंने कई बार ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत अधिकारी से आवास के लिए अनुरोध किया, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया। उन्हें यह कहकर भगा दिया जाता है कि “विकलांगों के लिए आवास नहीं आ रहे हैं, खुद बनवा लो”—जो न केवल असंवेदनशीलता दर्शाता है बल्कि सरकारी योजनाओं की मंशा पर भी सवाल खड़े करता है।इस पूरे मामले में स्थानीय अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। एक ओर सरकार गरीबों को छत देने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर पात्र लाभार्थियों को योजनाओं से वंचित किया जा रहा है।
विकलांग दंपति जैसी श्रेणी तो योजना में प्राथमिकता की हकदार होती है, बावजूद इसके उन्हें नजरअंदाज किया जाना प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है। क्या सिर्फ कागजों तक सीमित है योजना?ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में कई ऐसे लोग हैं जो पात्र नहीं हैं, फिर भी उन्हें आवास मिल गया, जबकि असली जरूरतमंद आज भी दर-दर भटक रहे हैं। इससे योजना की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
समाधान दिवस में उठी उम्मीद तहसील समाधान दिवस में शिकायत दर्ज होने के बाद अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। क्या इस विकलांग दंपति को उनका हक मिलेगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?यह घटना न सिर्फ सिस्टम की संवेदनहीनता को दर्शाती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि क्या “हर घर छत” का सपना वाकई हकीकत बन पाएगा या सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा।
